माधवी



माधवी

“सर, हम आ सकतीहैं?” दो छात्राएँ कक्षा कक्ष के मुख्य द्वार पर खड़ी थीं। यह एक की आवाज़ थी।

मैंने दूसरी वाली छात्रा से पूछा – “बेटा, आपको प्रवेश की अनुमति की आवश्यकता नहीं है क्या?”

छात्रा की आँखें जमीन की ओर हो गईं और वह बिना कोई उत्तर दिए चुपचाप खड़ी रही। फिर मैंने पूछा – “बेटा, तुम्हारा क्या नाम है?”

लड़की फिर भी मौन खड़ी रही, मुँह से एक अक्षर न निकला।

मैंने बड़े ही प्रेम से दोनों को उनकी सीट पर बैठने को कहा। वे बैठ गईं। इसी दौरान कक्षा की कुछ लड़कियाँ बोलीं – “सर, इसका नाम माधवी है।”

“क्यों? ये क्या नाम हुआ भला?” मैंने पूछा।

स्थिति देखकर पता चला कि उसका वास्तविक नाम माधवी है।

एक लड़की बोली – “सर, ये किसी से बात नहीं करती और न ही किसी को कोई जवाब देती है, सिर्फ मौन रहती है। इसलिए सब इसे मौनी बच्चा कहते हैं।”

तर्क सुनकर मैंने कहा – “इस तरह नाम नहीं बिगाड़ना चाहिए। पूरी कक्षा मौन।”

धीरे–धीरे पता चला कि माधवी बहुत ही शान्त, सरल और संकोची लड़की है। कक्षा में हमेशा वूयल और सभी प्रतियोगिताओं में सबसे आगे यही नाम आता है।

कुछ दिनों बाद विद्यालय में एक सज्जन मज़दूर आए। माथे पर पुरानी पगड़ी, कंधे पर गमछा, धोती, सफ़ेद कुरता और पैरों में चप्पल – जिसमें एक रिपेयर किया गया था। उन्होंने मुझसे कहा – “बड़े साहब कहाँ हैं? मुझे फोन करके बुलाया गया है।”

जेब से एक पुराना टूटा मोबाइल निकाला, जो रिचार्ज और प्लास्टिक टेप से लिपटा हुआ था। उन्होंने बताया कि वे माधवी के पिता हैं।

यह सुनकर मैं तुरंत उन्हें प्राचार्य कक्ष में ले गया, कुर्सी पर बैठाया और बोला – “आप शायद बड़े एम.डी. कॉलोनी से हैं?”

प्राचार्य एम.डी. के आते ही उन्होंने अपना नाम देशराज बताते हुए नम्रता से हाथ जोड़कर खड़े हो गए। एम.डी. ने स्वागत किया और बुलाने का कारण बताया –

“आपकी बेटी माधवी पढ़ाई में हमेशा उत्कृष्ट रहती है। कक्षा आठवीं में सबसे होशियार छात्रा रही है। खेलकूद प्रतियोगिता, नेशनल मीन मेरिट परीक्षा और कक्षा आठवीं में जिला स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। इस होनहार छात्रा पर पूरा विद्यालय गर्व करता है। सभी प्रकार से श्रेष्ठ परिणाम होने के कारण आपकी बेटी का चयन सम्पूर्ण जिले से सरकार की ओर से दस दिवसीय सम्पूर्ण भारत भ्रमण के लिए हुआ है। छात्रा को भेजने के लिए अभिभावकों की सहमति आवश्यक और अनिवार्य है, इसलिए आपको यहाँ बुलाया गया है।”

पिता का चेहरा खुशी से खिल गया। उनकी आँखों में आँसू थे। उन्होंने पूछा – “क्या मुझे भी साथ जाना है?”

“नहीं, जिसका चयन हुआ है, वही जाएगी। पूरे जिले से अलग-अलग विद्यालयों की कुल दस लड़कियाँ होंगी।” एम.डी. ने जवाब दिया।

पिता अपनी बेटी की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ सुनकर गर्व और खुशी महसूस कर रहे थे। आँखों में आंसू और चेहरा चमक रहा था।

छात्रा को अन्य विद्यार्थियों के साथ भारत भ्रमण की सहमति की बात सुनकर पिता सोच में पड़ गए जैसे कोई वस्तु गुम हो गई हो। आंखों की पलके झुक गईं, सांसें तेज होने लगीं और अनायास ठोड़ी पर हाथ रखते हुए बेटी की छवि की ओर देखने लगे। मन ही मन सोचने लगे –

“माधवी तो बहुत भोली, मासूम लड़की है। उसे दुनियादारी के छल–कपट का अनुभव नहीं है। वह तुरंत किसी पर विश्वास कर लेती है। अभी वह समझदार नहीं हुई है। परिवार की देखभाल में सही–गलत का भान नहीं होता, घर में बिना कारण की चोट या डाँट सह लेती है। कभी प्रतिकार नहीं करती। कभी गाँव या घर से बाहर नहीं गई। स्कूल भी पैदल लड़कियों के साथ जाती है। इन सबके बावजूद विद्यालय की ओर से माधवी को विदेश भ्रमण पर भेजने की बात एक डर का विषय बन गया था। यह सब सोचने के बाद उन्होंने गला खँखारकर कहा – “घर पर माधवी की माँ से पूछकर कुछ दिन बाद बताऊँगा।” ऐसा कहकर वे वहाँ से निकल गए।

रास्ते में चलते-चलते पिता के मन में क्या करें, क्या न करें, विचारों का द्वंद्व चल रहा था। बेटी की प्रतिभा से गर्वित थे, लेकिन उसकी सुरक्षा की चिंता उन्हें विचलित कर रही थी। आखिर में उन्होंने माधवी को न भेजने का मन बना लिया।

माधवी कक्षा में अपने दोस्तों और शिक्षकों की बातें ध्यान से सुनती थी। जब “गुड टच, बैड टच”, जेंडर संवेदनशीलता, शोषण, आत्मरक्षा जैसे विषय पढ़ाए जाते, तो उसे समझ में आता कि लड़कियों को कभी भय और अनुचित व्यवहार सहन नहीं करना चाहिए।

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(कहानी आगे चलती है जिसमें बस यात्रा का प्रसंग, अचानक हुई घटना, शोषण का प्रयास और माधवी की साहसिक प्रतिक्रिया – जोरदार प्रतिकार – का उल्लेख है। उसके बाद पुलिस में शिकायत, समाज में संदेश और अंत में प्राचार्य द्वारा उसे सम्मानित किया जाना और पूरे विद्यालय में प्रेरणा बन जाना बताया गया है।)


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✍️ लेखक – संजय sir 
Gsss namri


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