महर्षि दधीचि जयंती और राधा अष्टमी की शुभकामनाएं
ऋषि दधीचि हिंदू धर्म में एक प्राचीन, गुणी और अत्यधिक आध्यात्मिक ऋषि थे , जो अपने सर्वोच्च बलिदान के लिए प्रसिद्ध थे: उन्होंने वज्र बनाने के लिए अपनी हड्डियाँ दान कर दीं, जो एक शक्तिशाली वज्र हथियार था जिसका उपयोग इंद्र ने राक्षस वृत्र को हराने के लिए किया था । वह अपनी दयालुता, उदारता और गहन आध्यात्मिक ज्ञान के लिए जाने जाते हैं, उनका आश्रम गंगा नदी के पास स्थित है।
ऋषि दधीचि की कहानी के मुख्य पहलू:
महान बलिदान:
आवश्यकता के समय देवताओं ने अपने हथियारों की सुरक्षा के लिए दधीचि से संपर्क किया, जिन्हें उन्होंने तब तक सुरक्षित रखा जब तक कि राक्षसों को उनका स्थान पता नहीं चल गया। राक्षसों द्वारा हथियारों का उपयोग करने से रोकने के लिए, दधीचि ने मंत्रों के साथ उन्हें पानी में बदल दिया और उसे पी लिया, जिससे वे अदृश्य हो गए। जब देवता अपने हथियार लेने वापस लौटे, तो उन्होंने उनसे कहा कि उनकी हड्डियों का उपयोग उनके पुनः निर्माण के लिए किया जा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप वज्र का निर्माण हुआ।
आध्यात्मिक ज्ञान:
वे मधु विद्या नामक वैदिक अनुष्ठान के आचार्य थे और उन्हें तपस्या और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
परिवार और स्थान:
उनके माता-पिता अतर्वाण ऋषि और चिट्टी थे , हालांकि अन्य पुराणों में उनके पिता का उल्लेख महर्षि भृगु के रूप में किया गया है । वह अपनी पत्नी गबस्तानी के साथ गंगा नदी के पास नैमिषारण्य में रहते थे ।
शिव भक्ति:
दधीचि भगवान शिव के महान भक्त थे और अपने शांत, साहसी और दयालु स्वभाव के लिए जाने जाते थे।
उनकी कहानी निस्वार्थता और मानवता एवं देवताओं की भलाई के लिए अपने जीवन के बलिदान का प्रमाण है। सनातन धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि श्री राधाष्टमी के नाम से प्रसिद्ध है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी का प्राकट्य दिवस माना गया है। श्री राधाजी वृषभानु की यज्ञ भूमि से प्रकट हुई थीं। वेद तथा पुराणादि में जिनका ‘कृष्ण वल्लभा’ कहकर गुणगान किया गया है, वे श्री वृन्दावनेश्वरी राधा सदा श्री कृष्ण को आनन्द प्रदान करने वाली साध्वी कृष्णप्रिया थीं। कुछ महानुभाव श्री राधाजी का प्राकट्य श्री वृषभानुपुरी (बरसाना) या उनके ननिहाल रावल ग्राम में प्रातःकाल का मानते हैं। कल्पभेद से यह मान्य है, पर पुराणों में मध्याह्न का वर्णन ही प्राप्त होता है।
राधाष्टमी महोत्सव इस्कॉन वृन्दावन में
शास्त्रों में श्री राधा कृष्ण की शाश्वत शक्तिस्वरूपा एवम प्राणों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में वर्णित हैं अतः राधा जी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण जी की पूजा अधूरी मानी गयी है। श्रीमद देवी भागवत में श्री नारायण ने नारद जी के प्रति ‘श्री राधायै स्वाहा’ षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा तथा विलक्षण महिमा के वर्णन प्रसंग में श्री राधा पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा की अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है।
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