गणेश चतुर्थी विशेष
रणथंभौर गणेश मंदिर का इतिहास रणथंभौर किले के समय से जुड़ा है और यह भगवान गणेश को समर्पित है, जिनके तीन नेत्र हैं। एक मान्यता के अनुसार, महाराजा हम्मीर देव को राजा अलाउद्दीन खिलजी के साथ हुए युद्ध के दौरान गणेश जी ने सपने में दर्शन दिए थे, जिसके बाद उन्हें स्वयंभू गणेश जी की प्रतिमा मिली और उन्होंने मंदिर का निर्माण करवाया। दूसरी मान्यताओं के अनुसार, यह प्रतिमा त्रेतायुग में भगवान राम के समय से स्थापित थी और कृष्ण ने स्वयं रुक्मणी से विवाह के समय उन्हें रणथंभौर में ही मनाया था।
मुख्य मान्यताएँ और इतिहास
स्वयंभू प्रतिमा:
रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश जी की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई मानी जाती है, जिसे भारत के पहले स्वयंभू गणेश अवतारों में से एक माना जाता है।
हम्मीर देव और अलाउद्दीन खिलजी का युद्ध:
1299-1301 ईस्वी में जब रणथंभौर के किले में अलाउद्दीन खिलजी ने घेरा डाला और राशन खत्म होने लगा, तब महाराजा हम्मीर देव के सपने में गणेश जी ने दर्शन दिए। इसके बाद उन्हें स्वयंभू प्रतिमा मिली और उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया, जिससे युद्ध समाप्त हुआ।
भारत का प्रथम गणेश:
यह भी माना जाता है कि जब द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने विवाह के बाद गणेश जी को निमंत्रण देना भूल गए, तब गणेश जी के मूषकों ने कृष्ण के रथ को रोक दिया। तब कृष्ण ने रणथंभौर में आकर गणेश जी को मनाया था, जिससे रणथंभौर गणेश को 'प्रथम गणेश' कहा जाता है।
त्रेतायुग का संदर्भ:
एक अन्य मान्यता के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान राम ने लंका कूच करने से पहले इसी गणेश जी के स्वरूप का अभिषेक किया था।
विक्रमादित्य से संबंध:
यह भी कहा जाता है कि राजा विक्रमादित्य हर बुधवार को गणेश जी की पूजा करने रणथंभौर आते थे।
मंदिर की विशेषताएँ
त्रिनेत्र:
मंदिर में गणेश जी के तीन नेत्र हैं, जो ज्ञान और आत्मज्ञान का प्रतीक हैं।
मनोकामना पूर्ण करने का स्थान:
भक्त यहां पत्र भेजकर अपनी मन्नतें मांगते हैं और मनोकामना पूरी होने की कामना करते हैं।
मंगल कार्यों का निमंत्रण:
लोग किसी भी शुभ कार्य का पहला निमंत्रण पत्र रणथंभौर गणेश जी को भेजते हैं।
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