भारतीय संस्कृति
गौ-वत्स पूजा-अर्चना दिवस बच्छबारस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
भारतीय सनातन संस्कृति मे अनेक प्रकार के त्यौहार मनाए जाते हैं इन त्योहारों का ऐतिहासिक और संस्कृति मे अनेक प्रकार के महत्व है।
भारतीय सनातन संस्कृति मे अनेक प्रकार के त्यौहार मनाए जाते हैं इन त्योहारों का ऐतिहासिक और संस्कृति मे अनेक प्रकार के महत्व है।
भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की द्वादशी को वत्सला द्वादशी के रूप मेंमनाया जाता है। इस त्यौहार का अद्भुत महत्व है।
यह पर्व पुत्र की मंगल-कामना के लिए किया जाता है. इस पर्व पर गीली मिट्टी की गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियां बनाकर पाट पर रखी जाती हैं तब उनकी विधिवत पूजा की जाती है. भारतीय धार्मिक पुराणों में गौमाता में समस्त तीर्थ होने की बात कहीं गई है. पूज्यनीय गौमाता हमारी ऐसी मां है, जिसकी बराबरी न कोई देवी-देवता कर सकता है और न कोई तीर्थ. गौमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है, जो बड़े-बड़े यज्ञ, दान आदि कर्मों से भी नहीं प्राप्त हो सकता ।
बछबारस की कहानी:
बहुत समय पहले की बात है एक गाँव में एक साहूकार अपने सात बेटो और पोतो के साथ रहता था. उस साहूकार ने गाँव में एक तालाब बनवाया था लेकिन बारह सालो तक वो तालाब नही भरा था. तालाब नही भरने का कारण पूछने के लिए उसने पंडितो को बुलाया. पंडितो ने कहा कि इसमें पानी तभी भरेगा जब तुम या तो अपने बड़े बेटे या अपने बड़े पोते की बलि दोगे. तब साहूकार ने अपने बड़ी बहु को तो पीहर भेज दिया और पीछे से अपने बड़े पोते की बलि दे दी. इतने में गरजते बरसते बादल आये और तालाब पूरा भर गया.
इसके बाद बछबारस आयी और सभी ने कहा की “अपना तालाब पूरा भर गया है इसकी पूजा करने चलो”.साहूकार अपने परिवार के साथ तालाब की पूजा करने गया.वह दासी से बोल गया था की गेहुला को पका लेना.गेहुला से तात्पर्य गेहू के धान से है. दासी समझ नही पाई. दरअसल गेहुला गाय के बछड़े का नाम था. उसने गेहुला को ही पका लिया. बड़े बेटे की पत्नी भी पीहर से तालाब पूजने आ गयी थी. तालाब पूजने के बाद वह अपने बच्चो से प्यार करने लगी तभी उसने बड़े बेटे के बारे में पुछा.
तभी तालाब में से मिटटी में लिपटा हुआ उसका बड़ा बेटा निकला और बोला की माँ मुझे भी तो प्यार करो.तब सास बहु एक दुसरे को देखने लगी. सास ने बहु को बलि देने वाली सारी बात बता दी. फिर सास ने कहा की बछबारस माता ने हमारी लाज रख ली और हमारा बच्चा वापस दे दिया. तालाब की पूजा करने के बाद जब वह वापस घर लौटे तो उन्होंने देखा बछड़ा नही था. साहूकार ने दासी से पूछा की बछड़ा कहा है तो दासी ने कहा कि “आपने ही तो उसे पकाने को कहा था”.
साहूकार ने कहा की “एक पाप तो अभी उतरा ही है तुमने दूसरा पाप कर दिया “. साहूकार ने पका हुआ बछड़ा मिटटी में दबा दिया. शाम को गाय वापस लौटी तो वह अपने बछड़े को ढूंढने लगी और फिर मिटटी खोदने लगी. तभी मिटटी में से बछड़ा निकल गया. साहूकार को पता चला तो वह भी बछड़े को देखने गया. उसने देखा कि बछडा गाय का दूध पीने में व्यस्त था. तब साहूकार ने पुरे गाँव में यह बात फैलाई कि हर बेटे की माँ को बछबारस का व्रत करना चाहिए और तालाब पूजना चाहिए. हे बछबारस माता ! जैसा साहूकार की बहु को दिया वैसा हमे भी देना.कहानी कहते सुनते ही सभी की मनोकामना पूर्ण करना. इसके बाद गणेश जी की कहानी कहे.
बायना निकालना:
कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि एक कटोरी मोंठ ,बाजरा रखकर उसके उपर रुपया रख देवे. इनको रोली और चावल से छींटा देवे.दोनों हाथ जोडकर कटोरी को पल्ले से ढककर चार बार कटोरी के उपर हाथ फेर ले. फिर स्वयम के तिलक निकाले. यह बायना सांस को पाँव छुकर देवे. बछबारस के दिन बेटे की माँ बाजरे की ठंडी रोटी खाती है. इस दिन भैंस का दूध ,बेसन ,मोंठ आदि खा सकते है. इस दिन गाय का दूध, दही, गेहूं और चावल नही खाया जाता है.
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✒✒✒सनत शर्मा ✒✒✒
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